
कटनी। मध्य प्रदेश में टाइफॉयड के मामलों में इस साल तेजी से उछाल दर्ज किया गया है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश भर में टाइफॉयड के मरीजों की संख्या में लगभग 65% की बढ़ोतरी हुई है। डॉक्टरों का कहना है कि इस बढ़ोतरी के पीछे सिर्फ संक्रमण का फैलाव ही नहीं बल्कि गलत और अधूरी टेस्टिंग भी एक बड़ी वजह है।कटनी सहित जिले के कई अस्पतालों और प्राइवेट पैथोलॉजी में अब भी पारंपरिक विडाल टेस्ट को ही प्राथमिकता दी जाती है। यह टेस्ट सस्ता और जल्दी होने वाला है, लेकिन इसकी सटीकता बेहद कम है। ऐसे में कई मरीजों को गलत रिपोर्ट मिल रही है, जिससे समय पर इलाज शुरू नहीं हो पाता और हालत गंभीर हो जाती है।विशेषज्ञ बताते हैं कि गलत रिपोर्ट दो तरह से नुकसान करती है। एक ओर, असली मरीज का इलाज देर से होता है और बीमारी बिगड़ जाती है। दूसरी ओर, जिन लोगों को झूठी पॉजिटिव रिपोर्ट मिलती है, उन्हें अनावश्यक एंटीबायोटिक दवाएँ दी जाती हैं। इससे एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की समस्या बढ़ रही है, जो भविष्य में और बड़ी चुनौती बन सकती है।टाइफॉयड की पुष्टि के लिए ब्लड कल्चर टेस्ट को सबसे सही माना जाता है, जबकि पीसीआर टेस्ट भी ज्यादा विश्वसनीय है। लेकिन ये टेस्ट महंगे हैं और कटनी समेत छोटे शहरों व ग्रामीण इलाकों में आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। यही कारण है कि लोग मजबूरी में पुराने और कम भरोसेमंद टेस्ट पर निर्भर रहते हैं।स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदेश में बढ़ते टाइफॉयड मामलों ने स्वास्थ्य व्यवस्था की कमज़ोरियों को उजागर कर दिया है। ज़रूरत है कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग समय पर कदम उठाकर सस्ती और भरोसेमंद टेस्टिंग सुविधाएँ उपलब्ध कराए, ताकि आम लोगों को सही समय पर सही इलाज मिल सके और इस खतरनाक बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सके।








