
चंबल के गांधी सेवा आश्रम ने जगाई रोजगार की अलख, 1278 परिवारों को दिया काममुरैना। मध्य प्रदेश के जौरा में स्थित गांधी सेवा आश्रम, जो 53 साल पहले 654 डकैतों के आत्मसमर्पण का गवाह बना था, अब केवल गांधीवादी विचारों का केंद्र नहीं रहा, बल्कि यह देश भर के गरीब परिवारों के लिए रोजी-रोटी का जरिया बन गया है। यह आश्रम चंबल से लेकर उत्तराखंड, बिहार और असम तक 1278 परिवारों को तीन दशक से अधिक समय से कुटीर उद्योगों से जोड़कर सहारा दे रहा है।चार राज्यों में फैला रोजगार का नेटवर्कगांधी सेवा आश्रम का रोजगार नेटवर्क कई राज्यों में फैला हुआ है: * मध्य प्रदेश (चंबल क्षेत्र): * आश्रम जौरा, मुरैना और आसपास के क्षेत्रों में 1130 परिवारों को रोजगार दे रहा है। * इनमें 325 परिवार सूत कताई और खादी बुनाई का काम करते हैं। * 805 परिवार मधुमक्खी पालन से अपनी आजीविका चला रहे हैं। * उत्तराखंड: यहाँ 50 परिवार कालीन बुनाई और अगरबत्ती बनाने का काम करते हैं। * असम: असम के 50 परिवार आश्रम से जुड़कर साड़ी, चादर और साफी बनाने का काम करते हैं। * बिहार: बिहार में 48 परिवार दौरी (बांस की टोकरी) बनाने के काम से जुड़े हुए हैं।एक चक्की से शुरू हुआ सफरआश्रम में रोजगार की शुरुआत सबसे पहले एक आटा चक्की लगाकर की गई थी। आज यह संस्था खादी, सरसों तेल, मधुमक्खी पालन से शहद, केंचुआ खाद, स्वदेशी साबुन जैसे कई उत्पाद बना रही है। आश्रम के उत्पाद खादी ग्रामोद्योग, मध्य प्रदेश की जेलों, पुलिस महकमे, पुणे के प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र और उज्जैन के बाल आश्रम सहित कई स्थानों पर सप्लाई किए जाते हैं।आश्रम प्रबंधक प्रफुल्ल श्रीवास्तव ने बताया कि उनका प्रयास केवल गांधीवादी विचारों को फैलाना नहीं, बल्कि कुटीर उद्योगों के माध्यम से गरीब परिवारों को सशक्त बनाना भी है।गांधी सेवा आश्रम का इतिहासगांधीवादी विचारक डॉ. एसएन सुब्बाराव के प्रयासों से जौरा में 27 सितंबर 1970 को गांधी सेवा आश्रम की स्थापना की गई थी। यहीं पर 14 अप्रैल 1972 को समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण और उनकी पत्नी प्रभावती देवी की मौजूदगी में 654 डकैतों ने महात्मा गांधी की तस्वीर के सामने अपनी बंदूकें डालकर आत्मसमर्पण किया था।








